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पाकिस्तान में VPN और इंटरनेट विवाद क्यों हो रहा है, जानिए क्या है पूरा मामला?

पाकिस्तान में वीपीएन उपयोग और इंटरनेट सेंसरशिप का विवाद तेजी से बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने विवाद को हवा दी, क्योंकि पाकिस्तान में कई प्लेटफॉर्म प्रतिबंधित हैं। आलोचकों का कहना है कि वीपीएन का उपयोग सरकार द्वारा भी किया जा रहा है, जबकि आम जनता पर इसे प्रतिबंधित किया गया है।

पाकिस्तान में VPN और इंटरनेट विवाद क्यों हो रहा है, जानिए क्या है पूरा मामला?
पाकिस्तान में वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) का उपयोग और इंटरनेट सेंसरशिप का मुद्दा गर्माया हुआ है। हालिया विवाद तब बढ़ा जब प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने एक्स सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डोनाल्ड ट्रंप को जीत की बधाई दी। इसके बाद आलोचकों ने सवाल उठाया कि पाकिस्तान में कुछ प्लेटफॉर्म बैन होने के बावजूद, प्रधानमंत्री ने  वीपीएन का उपयोग करके यह पोस्ट किया है।

वीपीएन और पाकिस्तान में इंटरनेट सेंसरशिप

पाकिस्तान में कई सोशल मीडिया और इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध हैं। सरकार का दावा है कि ये कदम "राष्ट्र की सुरक्षा" और "धार्मिक भावनाओं" की रक्षा के लिए उठाए गए हैं। लेकिन वीपीएन के जरिए लोग इन प्रतिबंधों को आसानी से पार कर लेते हैं। हाल के वर्षों में, पाकिस्तान सरकार ने वीपीएन उपयोगकर्ताओं को ट्रैक करने और इसे प्रतिबंधित करने के कई प्रयास किए हैं। 2020 में, पाकिस्तान टेलीकम्युनिकेशन अथॉरिटी (PTA) ने बिना लाइसेंस वाले वीपीएन पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

पाकिस्तान में इंटरनेट सेंसरशिप और साइबर सुरक्षा के नाम पर हाल ही में ऐसा कदम उठाया गया है जिसने पूरे देश और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा है। धार्मिक मामलों की शीर्ष सलाहकार संस्था, काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी, ने वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) को इस्लामिक कानून के खिलाफ करार दिया है। इस फैसले ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, तकनीकी पहुंच और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच बहस को जन्म दिया है।
VPN पर बैन और इस्लामिक विचारधारा
पाकिस्तान में धार्मिक मामलों पर चर्चा करने वाली काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी ने अपनी राय में कहा कि VPN का इस्तेमाल अनैतिक उद्देश्यों के लिए करना इस्लामिक सिद्धांतों के विरुद्ध है। शाहबाज शरीफ पर आरोप है कि उन्होंने एक प्रतिबंधित प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया पर बधाई संदेश पोस्ट किया। इसने एक नई बहस को जन्म दिया। 

रागिब नईमी, काउंसिल के अध्यक्ष, ने इसे "पाप" की श्रेणी में रखा। उनका मानना है कि VPN का उपयोग मुख्य रूप से गैरकानूनी सामग्री, समाज में अराजकता और गलत सूचना फैलाने के लिए किया जाता है। काउंसिल के अनुसार, इस तकनीक का दुरुपयोग समाज के नैतिक ढांचे को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि VPN, जिस पर सरकार की सीधी निगरानी नहीं है, कई बार आतंकवाद और गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देने में सहायक साबित होता है।

पाकिस्तान सरकार ने शुक्रवार (15 नवंबर) को देशव्यापी फ़ायरवॉल सिस्टम लागू किया और VPN को पाकिस्तान टेलीकम्युनिकेशन अथॉरिटी (PTA) के साथ पंजीकरण अनिवार्य कर दिया। सरकार के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य साइबर सुरक्षा को मजबूत करना, आतंकवाद और वित्तीय अपराधों को रोकना, और गैरकानूनी कंटेंट, जैसे पोर्नोग्राफी, पर प्रतिबंध लगाना है। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह कदम व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमले जैसा है। आलोचकों का कहना है कि सरकार खुद वीपीएन का उपयोग कर रही है जबकि आम जनता पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।
वीपीएन और इसकी जरूरत
वीपीएन तकनीक यूजर्स को अपनी लोकेशन छुपाने और इंटरनेट पर सुरक्षित तरीके से ब्राउजिंग की सुविधा देती है। पाकिस्तान में वीपीएन का उपयोग न केवल सोशल मीडिया तक पहुंचने के लिए बल्कि पत्रकारों और एक्टिविस्टों द्वारा भी किया जाता है ताकि वे अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकें।

पाकिस्तान में VPN पर बैन और फतवे ने एक जटिल बहस को जन्म दिया है। जहां सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक मानती है, वहीं आलोचकों का मानना है कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता पर चोट है। इस कदम का लंबी अवधि में क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखना बाकी है।

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