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'हमारे हित सर्वोपरि, नहीं चलेगा डबल स्टैंडर्ड...', NATO को भारत ने दिखाई कूटनीतिक सख्ती

भारत ने नाटो चीफ मार्क रूट की रूस से व्यापार करने वाले देशों पर 100% सेकेंडरी टैरिफ की धमकी को खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत की प्राथमिकता अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करना है और वह किसी के दबाव में नहीं आएगा. भारत ने पश्चिमी देशों को दोहरे मापदंड के प्रति आगाह भी किया है.

'हमारे हित सर्वोपरि, नहीं चलेगा डबल स्टैंडर्ड...', NATO को भारत ने दिखाई कूटनीतिक सख्ती

दुनिया भर में जब कूटनीतिक दबाव और रणनीतिक बयानबाजी अपने चरम पर है, तब भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह अपने हितों से कोई समझौता नहीं करेगा. नाटो प्रमुख मार्क रूट की चेतावनी, जिसमें रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत सेकेंडरी टैरिफ लगाने की बात कही गई थी, भारत ने दो टूक शब्दों में उसे खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय की तरफ से इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ कहा कि भारत की पहली प्राथमिकता अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को सुरक्षित करना है.

क्या थी नाटो चीफ की धमकी?
नाटो प्रमुख मार्क रूट ने हाल ही में अमेरिका के सीनेटरों के साथ एक बैठक के बाद चीन, ब्राजील और भारत को सीधा संदेश दिया. उन्होंने कहा कि यदि ये देश रूस से तेल और गैस की खरीद जारी रखते हैं, और अगर व्लादिमीर पुतिन शांति समझौते के लिए गंभीर नहीं होते, तो इन देशों को 100 फीसदी सेकेंडरी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है. उनका साफ कहना था कि "अगर आप भारत के प्रधानमंत्री हैं, ब्राजील या चीन के राष्ट्रपति हैं और रूस से व्यापार कर रहे हैं, तो समझ लीजिए कि अगर पुतिन नहीं माने, तो इसके लिए तैयार रहिए."

भारत की प्रतिक्रिया
भारत ने इस बयान को गंभीरता से तो लिया, लेकिन झुकने से इनकार कर दिया. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “हमने इस विषय पर रिपोर्टें देखी हैं और घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं. हमारे लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है. और इसमें हम बाजार की स्थितियों और वैश्विक परिप्रेक्ष्य से निर्देशित होते हैं. हम किसी भी दोहरे मापदंड को स्वीकार नहीं करते.” यह बयान बताता है कि भारत अब केवल एक तटस्थ दर्शक नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर खेलने वाला आत्मनिर्भर राष्ट्र है.

यूरोप खुद कितना खरीदता है रूसी तेल?
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का बयान भी गौर करने लायक है. उन्होंने बीते दिनों एक इंटरव्यू में साफ तौर पर कहा कि भारत किसी एक देश पर अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए निर्भर नहीं है. उन्होंने यह भी खुलासा किया कि भारत रूस से जितना तेल एक तिमाही में खरीदता है, यूरोप उससे कई गुना ज्यादा मात्रा सिर्फ आधे दिन में खरीद लेता है. फिर भारत को ही क्यों निशाना बनाया जाता है? यह सवाल सिर्फ भारत नहीं, बल्कि विकासशील देशों के लिए भी एक चेतावनी है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ताकतवर देशों के दोहरे मापदंड कैसे काम करते हैं.

ट्रंप ने भी दी थी धमकी 
नाटो चीफ के बयान से कुछ दिन पहले, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी रूस से तेल खरीदने वाले देशों को चेतावनी दी थी. उनका कहना था कि अगर रूस 50 दिनों के भीतर यूक्रेन से शांति समझौता नहीं करता, तो रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 100 फीसदी सेकेंडरी सैंक्शन लगाए जा सकते हैं. यह साफ है कि अमेरिका और नाटो दोनों रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए भारत जैसे देशों को निशाने पर ले रहे हैं.

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क्या रूस से तेल खरीदना गलत है?
इस सवाल का जवाब भारत ने साफ शब्दों में दिया है. किसी भी राष्ट्र की प्राथमिकता उसके नागरिकों की भलाई और जरूरत होती है. भारत की ऊर्जा आवश्यकता विश्व की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है. अगर बाजार में रूस से सस्ता और स्थिर आपूर्ति वाला तेल मिल रहा है, तो भारत उसे क्यों न खरीदे? इसमें कोई नैतिक या राजनीतिक विरोधाभास नहीं है, बल्कि यह वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप एक प्रैक्टिकल फैसला है. बता दें कि मार्क रूट और ट्रंप जैसे नेताओं की चेतावनियों के बीच भारत की कूटनीतिक दृढ़ता यह साबित करती है कि अब यह देश वैश्विक राजनीति में एक परिपक्व और आत्मनिर्भर भूमिका निभा रहा है. भारत न किसी के दबाव में झुकता है, न ही अपने नागरिकों के हितों को ताक पर रखता है.

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