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खालिस्तान के लिए भारत से पंगा लेना पुरानी आदत, ट्रूडो के पिता भी करते थे यही काम

जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे इलियट ट्रूडो जब कनाडा के प्रधानमंत्री थे तो भी भारत और कनाडा के रिश्ते बिगड़ गए थे। जिसके कारण उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा था. अब जस्टिन ट्रूडो भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते नजर आ रहे हैं।

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18 Oct 2024
( Updated: 05 Dec 2025
04:18 PM )
खालिस्तान के लिए भारत से पंगा लेना पुरानी आदत, ट्रूडो के पिता भी करते थे यही काम
खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर भारत और कनाडा के बीच शुरू हुआ कूटनीतिक विवाद पिछले सप्ताह चरम पर पहुंच गया। दोनों देशों ने एक दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित किया है और एक दूसरे पर आरोप लगाए। संबंधों में उस समय कड़वाहट आ गई, जब सोमवार को कनाडा ने भारत के उच्चायुक्त और अन्य राजनयिकों को अपनी धरती पर सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से जोड़ा। भारत ने आरोपों को दृढ़ता से खारिज किया और इसे प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की 'वोट बैंक की राजनीति' का हिस्सा बताया। अब आपका ये जानना भी जरूरी है कि भारत की तरफ  गलत नजर से देखना और भारत कनाडा के रिश्तों के बिगड़ने का इतिहास पुराना है। लेकिन हालिया तनाव सितंबर 2023 से चल रहा है। भारत और कनाडा के रिश्तों में तनाव नया नहीं है, बल्कि जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे इलियट ट्रूडो जब कनाडा के प्रधानमंत्री थे तो भी भारत और कनाडा के रिश्ते बिगड़ गए थे। 


जिसके कारण उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा था। अब जस्टिन ट्रूडो भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते नजर आ रहे हैं। भारत और कनाडा के बीच तनाव साल 1974 में शुरू हुआ था, जब भारत के परमाणु परीक्षणों की ओर कदम बढ़ाने शुरू किये थे। जब तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री पियरे ट्रूडो की सरकार ने परीक्षणों पर नाराजगी जाहिर करते हुए, भारत के साथ दूरियां बढ़ा ली थी। ये तनाव 1998 में और बढ़ गया, जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया। कनाडा ने भारत के परीक्षण को एक विश्वासघात के रूप में लिया। कनाडा के नीति निर्माताओं का मानना था कि भारत की परमाणु क्षमताएं गैर-परमाणु देशों को भी इसी तरह की कोशिशों के लिए प्रेरित करेंगी। जस्टिन के पिता पियरे वर्ष 1968 से लेकर 1979 और 1980 से 1984 के बीच कनाडा के प्रधानमंत्री रहे थे। इस दौरान भारत में खालिस्तानियों का आतंक चरम पर था।

1980 के दशक में जब पंजाब में खालिस्तानी चरमपंथियों की घटनाएं अपने चरम पर थीं और भारत सरकार ने उग्रवाद के खिलाफ अभियान छेड़ा था, उस वक्त भारत से भागने वाले खालिस्तानियों के लिए कनाडा एक पसंदीदा ठिकाना बन गया था। पियरे के कार्यकाल में कई खालिस्तानियों ने भारत सरकार से बचकर कनाडा में शरण ली थी। खालिस्तानी समूह बब्बर खालसा का सदस्य तलविंदर सिंह परमार 1981 में पंजाब में दो पुलिसकर्मियों की हत्या करने के बाद कनाडा भाग गया. भारत ने जब परमार को वापस सौंपने का अनुरोध किया। तो पियरे ट्रूडो प्रशासन ने भारत के इस अनुरोध को नकार कर दिया। यहां तक कि भारतीय खुफिया एजेंसियों की चेतावनियों पर भी ध्यान नहीं दिया गया। भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जब 1984 में हत्‍या हुई थी। तब खालिस्‍तानी आतंकियों ने कनाडा में एक परेड निकाली थी। इस पर भारत ने कनाडा सरकार के सामने अपनी आपत्ति जाहिर की थी। भारत ने कहा था कि ऐसा नहीं होना चाहिए था और जिन्‍होंने ये किया है। उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन तक भी कनाडा के प्रधानमंत्री ने परेड निकालने वाले खलिस्‍तानियों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया था और चुप्‍पी साध ली थी।


दोनों देशों का तनाव अपने चरम पर 23 जून 1985 को एयर इंडिया फ़्लाइट 182 में हुए बम विस्फोट के बाद आया। जिसमें 329 लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश कनाडाई थे। इस हमले का मास्टरमांइड खालिस्‍तानी आतंकी तलविंदर सिंह परमार को माना गया। लेकिन पियरे ट्रूडो सरकार ने उसके ऊपर मुकदमा नहीं चलाया और बम विस्फोट के सिलसिले में सिर्फ एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया।

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