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भारत-पाक तनाव को अमेरिका की व्यापार नीति से कैसे जोड़ा गया? जानिए अंदर की बात

हाल ही में अमेरिका की एक संघीय अदालत में ट्रंप प्रशासन ने ऐसा दावा किया जिससे भारत-पाक सीजफायर की नींव तक हिल गई. ट्रंप सरकार के मुताबिक, राष्ट्रपति ने भारत-पाक के बीच युद्ध रोकने के लिए व्यापार रियायतों का इस्तेमाल किया था. कोर्ट में वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि अगर राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित किया गया, तो इससे सिर्फ अमेरिका-चीन व्यापार नहीं, बल्कि भारत-पाक शांति भी प्रभावित हो सकती है.

भारत-पाक तनाव को अमेरिका की व्यापार नीति से कैसे जोड़ा गया? जानिए अंदर की बात
हाल ही में अमेरिका की कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने भारत और पाकिस्तान के बीच बने सीजफायर समझौते पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं. यह मामला ट्रंप प्रशासन के उस फैसले से जुड़ा है जिसमें वैश्विक स्तर पर टैरिफ यानी शुल्क लगाए गए थे. इस पर व्यापारिक संगठनों ने आपत्ति जताई और मामला अदालत तक पहुंचा. ट्रंप प्रशासन की ओर से वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक समेत चार वरिष्ठ मंत्रियों ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए जो दलील दी वह चौंकाने वाली थी. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्यापारिक रियायतों को कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया ताकि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध टल सके. उनके अनुसार यदि अदालत ट्रंप की 'राष्ट्रीय आपातकाल' वाली दलील को खारिज करती है तो इसका असर भारत-पाक के संघर्ष पर भी पड़ सकता है.

क्या यह वास्तव में अमेरिका की रणनीति थी?

हॉवर्ड लुटनिक की इस दलील के पीछे अमेरिका की बहुस्तरीय रणनीति दिखाई देती है. ट्रंप सरकार चीन के साथ हुए व्यापार समझौते को भी इसी फैसले से जोड़ती है. लुटनिक ने साफ किया कि यदि ट्रंप की शक्तियों पर रोक लगती है तो अमेरिका के लिए वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक दबाव बनाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में भारत-पाक के बीच तनाव या फिर अमेरिका-चीन व्यापारिक संतुलन बिगड़ सकता है. यह बयान अमेरिका की उस कोशिश को भी उजागर करता है जिसमें वह कूटनीति के साथ-साथ व्यापारिक फैसलों को मिलाकर वैश्विक राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है.

भारत की सख्त प्रतिक्रिया और साफ संदेश

भारत ने अमेरिका की इन दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल ने 13 मई को यह स्पष्ट किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच 10 मई को हुआ सीजफायर समझौता पूरी तरह भारत की सैन्य रणनीति का हिस्सा था. अमेरिका के किसी भी व्यापारिक कदम या बयान का इससे कोई संबंध नहीं था. भारत ने यह भी बताया कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर शुरू हुआ, जो पूरी तरह भारत की नीति के तहत था. अमेरिका ने भले ही अपने पक्ष में दलील दी हो, लेकिन भारत ने स्पष्ट किया कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा न तो किसी व्यापार समझौते से जुड़ी है और न ही वह किसी विदेशी सरकार के दबाव में चलती है.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यापार और युद्ध का गठजोड़

यह मामला एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय शक्तियां अपने व्यापारिक हितों को कूटनीति के जरिए साधने की कोशिश करती हैं. अमेरिका ने ट्रंप शासन में जिस तरह व्यापारिक छूट और टैरिफ को कूटनीतिक हथियार बनाया, वह आज वैश्विक कूटनीति का नया चेहरा है. भारत-पाक तनाव जैसे गंभीर मुद्दों पर व्यापारिक शर्तों को जोड़ना, किसी भी संप्रभु देश की नीति को प्रभावित करने की कोशिश कही जा सकती है. भारत का रुख साफ है कि वह अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा, भले ही दुनिया की सबसे बड़ी ताकत उसके सामने खड़ी हो.

ट्रंप प्रशासन की अदालत में दी गई यह दलील भारत-पाक रिश्तों की एक नई परत खोलती है. सीजफायर सिर्फ सीमा पर गोलियों का रुकना नहीं होता, यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले समीकरणों का भी हिस्सा बन चुका है. भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह अपनी सैन्य रणनीति और सुरक्षा नीतियों में किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करता. अमेरिका की अदालत में दिए गए तर्क यह दर्शाते हैं कि वैश्विक राजनीति में अब व्यापार भी युद्ध का एक नया हथियार बनता जा रहा है. सवाल यही है कि क्या ऐसी रणनीतियां लंबे समय तक शांति बनाए रख सकती हैं या फिर यह सिर्फ अस्थायी समीकरण हैं?

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