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उत्तराखंड में महिलाओं ने स्वरोजगार में पुरुषों को दी मात, यूपी को भी पछाड़ा !

उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जहां महिलाएं हमेशा अर्थव्यवस्था की रीड रही है, और एक बार फिर से आंकडों में यही तस्वीर दिखती है, उत्तराखंड की 82.1% महिलाएं स्वरोजगार करती हैं

उत्तराखंड में महिलाओं ने स्वरोजगार में पुरुषों को दी मात, यूपी को भी पछाड़ा !

रोज़गार की तलाश में घर को छोड़कर, परिवार को छोड़कर, गांव को छोड़कर युवाओं को जाना पड़ता है. देश में ऐसे राज्यों की फेहरिस्त लंबी है जो रोज़गार की समस्या से जूझ रहे हैं. इन राज्यों के लोगों को रोज़गार की तलाश में अपने घरों को छोड़कर बड़े-बड़े शहरों में जाना पड़ता है. ऐसा इसलिए क्योंकि लोग नौकरी की तलाश में रहते हैं. नौकरी को प्राथमिकता देना हमारे खून में रच-बस गया है और इसके लिए देश की शिक्षा प्रणाली ज़िम्मेदार है, जो सिर्फ नौकर बनना सिखा रही है.

लेकिन कई राज्य इस परंपरा को बदलने की ठान चुके हैं, जैसे उत्तराखंड. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने लोगों के दर्द को समझा और राज्य को संवारने के लिए युद्ध स्तर पर काम किया, जिसका असर दिखने लगा है. उत्तराखंड के लोग अब स्वरोज़गार को अपना रहे हैं और नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं. महिलाएं तो पुरुषों से भी ज़्यादा स्वरोज़गार को अपना रही हैं.

स्वरोज़गार के जो आंकड़े उत्तराखंड से सामने आए हैं, वो बड़े-बड़े राज्यों को हैरान कर रहे हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक, एक करोड़ से कुछ ज़्यादा की आबादी वाले उत्तराखंड में लगभग 50% महिलाएं हैं और हर 10 में से 8 महिलाएं स्वरोज़गार से जुड़ी हैं.

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में 80 फ़ीसदी से अधिक महिलाएं स्वरोज़गार से जुड़ी हैं. रिपोर्ट में दिए आंकड़ों से पता चलता है कि देशभर में स्वरोज़गार के मामले में ग्रामीण महिलाएं आगे हैं. उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में यह औसत देश से भी बेहतर है.

यहां 82.1% महिलाएं स्वरोज़गार करती हैं जबकि स्वरोज़गार से जुड़े पुरुषों की संख्या करीब 54% है. हालांकि शहरी क्षेत्रों में 45.3% पुरुष स्वरोज़गार कर रहे हैं जबकि महिलाओं का आंकड़ा 39% ही है. देशभर की बात करें तो ग्रामीण क्षेत्रों में 59.4% पुरुष और 73.5% महिलाएं स्वरोज़गार से जुड़ी हैं.

ग्रामीण इलाकों में खेती के अलावा महिलाओं के स्वरोज़गार से जुड़ने के सपने को स्वयं सहायता समूह, मनरेगा और प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम ने मुख्य भूमिका निभाई है. सरकार ने इन कार्यक्रमों की मदद से महिलाओं ने स्थानीय उत्पादों को नई पहचान दिलाई है. उत्तराखंड सरकार की मुहिम "हिमालयन ब्रांड" ने भी राज्य के स्थानीय उत्पादों को दुनिया के बाज़ार तक पहुंचाया है. इनमें जड़ी-बूटी, जूस, मसाले, अचार, स्थानीय परिधान और मोटे अनाज से तैयार उत्पाद शामिल हैं.

स्वरोज़गार से उत्तराखंड की महिलाएं राज्य को नई पहचान दिला रही हैं. धामी सरकार ने होमस्टे को भी रोज़गार का नया अवसर बनाया है. मुद्रा योजना के तहत होमस्टे के लिए लोन दिया गया है. इसके अलावा भी स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए गए हैं.

मोदी और धामी ने मिलकर जो मुहिम शुरू की थी, उसका असर बड़े पैमाने पर अब दिखने लगा है.

सरकारी उपक्रमों से उत्तराखंड के लोगों की जीवनशैली बदल रही है. वहां रोज़गार के नए अवसर बन रहे हैं. जो लोग रोज़गार के लिए पलायन कर गए थे, वे अब वापस लौट रहे हैं. उत्तराखंड अपने लोगों के साथ मिलकर नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.


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