झारखंड: गुमला में ग्रामीणों ने रचा इतिहास, 14 साल पहाड़ काटकर बनाई 5 KM लंबी नहर

झारखंड के गुमला जिले के रेहे कुंबाटोली गांव ने आज पूरे देश के लिए एक मिसाल बन गया है. जहां सरकारें वर्षों तक वादे करती रहीं, वहीं यहां के ग्रामीणों ने अपनी मेहनत, एकता और सामूहिक श्रमदान से एक ऐसा काम कर दिखाया है. ग्रामीणों ने 14 वर्षों में एक चट्टानी पहाड़ को काटकर 5 किलोमीटर लंबी नहर बनाई, और वह भी बिना किसी मशीनरी, सरकारी सहायता या ठेकेदार के.

झारखंड: गुमला में ग्रामीणों ने रचा इतिहास, 14 साल पहाड़ काटकर बनाई 5 KM लंबी नहर

जहां सरकारें सालों तक वादे करती रह जाती हैं, वहीं झारखंड के गुमला ज़िले के बिशुनपुर ब्लॉक के एक छोटे से गांव रेहे कुंबाटोली ने संकल्प, एकता और मेहनत से ऐसा काम कर दिखाया है, जो मिसाल बन गया है. यहां स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर पहाड़ काटकर गांव तक पानी पहुंचा दिया, जिससे अब सालों की प्यास बुझ गई है. 

ग्रामीणों का वनवास पूरा हुआ
दरअसल, झारखंड के गुमला जिले के रेहे कुंबाटोली गांव ने आज पूरे देश के लिए एक मिसाल बन गया है. जहां सरकारें वर्षों तक वादे करती रहीं, वहीं यहां के ग्रामीणों ने अपनी मेहनत, एकता और सामूहिक श्रमदान से एक ऐसा काम कर दिखाया है, जिसे देख देशभर के लोग सराहना कर रहे हैं. उन्होंने 14 वर्षों में एक चट्टानी पहाड़ को काटकर 5 किलोमीटर लंबी नहर बनाई, और वह भी बिना किसी मशीनरी, सरकारी सहायता या ठेकेदार के, गांव में पेयजल की भारी किल्लत थी. गर्मियों में हालत और भी बदतर हो जाती थी. गांव की महिलाएं रोज़ाना कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर थीं. सरकारी योजनाएं या तो अधूरी रह गईं, या फिर शुरू ही नहीं हो पाईं. तब ग्रामीणों ने तय किया कि वे खुद ही अपनी तक़दीर लिखेंगे.

सामूहिक श्रमदान बना ताकत
ग्रामीणों ने 'श्रमदान' की परंपरा को जीवंत किया. बिना किसी मशीन या आधुनिक संसाधन के, उन्होंने चट्टानी पहाड़ों को काटा और एक स्थायी जलमार्ग बनाया. 5 किलोमीटर लंबी इस नहर को बनाने में उन्हें लगातार 14 साल लगे. इस प्रयास से अब गांव में साफ़ पानी की स्थायी उपलब्धता है. पानी आने के बाद गांव में बदलाव की लहर आ गई. हज़ारों एकड़ बंजर ज़मीन अब हरी-भरी खेतों में बदल चुकी है. लोग अब दो से तीन फसलों की खेती कर रहे हैं. पशुपालन में भी सुधार हुआ है. गांव के रहने वाले चंपा भगत बताते हैं कि हर साल बारिश में नहर टूट जाती थी, लेकिन ग्रामीण फिर से जुट जते थे. गांव के लोगों ने कभी हार नहीं मानी. अपने सिर पर बालू, सीमेंट, ढोकर पहाड़ चढ़ते है. यही मेहनत आज साकार हुई है. इसके अलावा ग्रामीणों ने यह भी कहा कि अब हमोग लोग सब्ज़ी उगाकर बाजार में बेच सकेंगे. जो ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाएगा.

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प्रशासन और विशेषज्ञों की भी सराहना
इस सामूहिक प्रयास को देखकर प्रशासन भी हैरान रह गया है. कई अधिकारी और स्वयंसेवी संगठन अब इस मॉडल को अन्य गांवों में लागू करने की बात कह रहे हैं. रेहे कुंबाटोली गांव अब आत्मनिर्भर भारत की ज़मीन से निकली एक असली तस्वीर बन चुका है.

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