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उत्तराखंड में लागू हो गया नया भू-कानून, इन ज़िलों में ज़मीन नहीं ख़रीद पाएंगे बाहरी लोग

उत्तराखंड में नए भू-कानून पर राज्यपाल ने अपनी मुहर लगा दी है. इस कानून के लागू होते ही हरिद्वार और उधमसिंह नगर को छोड़कर अन्य 11 पर्वतीय जिले में कोई भी बाहरी व्यक्ति जमीन नहीं खरीद पाएगा. जानें क्या है ये कानून?

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04 May 2025
( Updated: 11 Dec 2025
07:47 AM )
उत्तराखंड में लागू हो गया नया भू-कानून, इन ज़िलों में ज़मीन नहीं ख़रीद पाएंगे बाहरी लोग

उत्तराखंड सरकार ने आखिरकार वो कर दिखाया जिसकी मांग पिछले कई सालों से उठ रही थी, जिसे लेकर कई बार सियासत भी गरमाई है. राज्य के लोगों का भू-कानून को लेकर एक लंबा इंतजार अब खत्म हुआ. उत्तराखंड में नए भू-कानून पर राज्यपाल ने अपनी मुहर लगा दी है. इस कानून के लागू होते ही हरिद्वार और उधमसिंह नगर को छोड़कर अन्य 11 पर्वतीय जिलों में कोई भी बाहरी व्यक्ति जमीन नहीं खरीद पाएगा. हालांकि, कुछ शर्तें पूरी करने के बाद व्यावसायिक निवेश के लिए जमीन खरीदी जा सकती है. क्या है भू-कानून? क्यों लंबे समय से इसकी मांग की जा रही थी, आपको समझाते हैं.

दरअसल, उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण सुरक्षा के उद्देश्य से यह संशोधन विधेयक पेश किया गया था, जिसमें गैर-निवासियों के राज्य में कृषि भूमि खरीद पर रोक लगा दी गई है. नया कानून लागू हो जाने के बाद अल्मोड़ा, बागेश्वर, चमोली, चंपावत, देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी और नैनीताल जिलों में कृषि, उद्यान के लिए जमीन खरीदना प्रतिबंधित हो जाएगा. अब दूसरे राज्य के बाहरी लोग देवभूमि में खेती और हॉर्टिकल्चर के लिए जमीन नहीं खरीद सकेंगे. बीते दशक में उत्तराखंड में खेती-किसानी की जमीनें तेजी से अलग इस्तेमाल में आने लगी थीं, जिसके बाद इस तरह के भू-कानून की मांग उठने लगी थी.

क्या है प्रावधान?

भू-कानून के मुताबिक अब उत्तराखंड में बाहर के व्यक्तियों को राज्य में जमीन खरीदने से पहले सब-रजिस्ट्रार को एक हलफनामा देना होगा, जिसमें उनके द्वारा यह पुष्टि की जाएगी कि न तो उन्होंने और न ही उनके परिवार ने आवासीय उद्देश्यों के लिए राज्य में कहीं और 250 वर्ग मीटर से अधिक जमीन खरीदी है. यदि भूमि का उपयोग जिस उद्देश्य के लिए खरीदी गई है, उसके लिए नहीं किया जाता है या उचित प्राधिकरण को सूचित किए बिना बेची जाती है, उपहार में दी जाती है या ट्रांसफर की जाती है, तो खरीदार के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. फिलहाल साल 2018 में त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार के बनाए हुए तमाम भूमि कानून रद्द कर दिए गए हैं. उत्तराखंड के 11 जिलों में बाहरी लोग खेती और बागवानी के लिए जमीन नहीं ले सकेंगे, इसमें हरिद्वार और उधम सिंह नगर शामिल नहीं हैं. पहाड़ी इलाकों में जमीन पर नए सिरे से बात होगी. जिला मजिस्ट्रेट जमीन खरीदने पर मुहर नहीं लगा सकेगा. लैंड की खरीदी-बिक्री के लिए ऑनलाइन पोर्टल तैयार किया जाएगा ताकि डेटा व्यवस्थित रहे. पोर्टल से यह भी पता लगेगा कि कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं हो रही. अगर राज्य से बाहर के लोग उत्तराखंड में जमीन लेना चाहें तो उन्हें एफिडेविट देना होगा और मकसद बताना होगा. अगर कोई जमीन नियम तोड़कर खरीदी-बेची जाए तो सरकार उसे अपने कब्जे में ले सकेगी.

जमीन खरीद को लेकर सख्ती क्यों?

आजादी के बाद से उत्तर प्रदेश से अलग होकर राज्य बनने तक उत्तराखंड में जमीन खरीदने पर कोई रोक-टोक नहीं थी. यहां तक कि अलग राज्य बनने के बाद भी इस पर पाबंदी नहीं लगाई गई. इसका नुकसान उत्तराखंड के लोगों को भुगतना पड़ा. धीरे-धीरे बाहरी लोग उत्तराखंड में सस्ती जमीनें खरीदकर अपने मुताबिक इस्तेमाल करने लगे, जिससे स्थानीय लोग परेशान होने लगे. क्योंकि उत्तराखंड टूरिज्म के लिहाज से लोगों को बहुत पसंद है. जिसका फायदा बाहरी लोग जमीनें खरीदकर फार्म हाउस, होटल और रिजॉर्ट्स बनाकर उठाते थे. हालात यहां तक आ गए कि स्थानीय लोगों को खेती के लिए जमीन कम पड़ने लगी.

तीन साल से सरकार की थी कोशिश

सशक्त भू-कानून की मांग को देखते हुए धामी सरकार करीब तीन साल से काम कर रही थी. 2022 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसने 5 सितंबर 2022 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी. समिति ने सशक्त भू-कानून को लेकर 23 सिफारिशें की थीं. सरकार ने समिति की रिपोर्ट और संस्तुतियों के अध्ययन के लिए उच्च स्तरीय प्रवर समिति का गठन भी किया था. इससे पहले कृषि और उद्यानिकी के लिए भूमि खरीद की अनुमति देने से पहले खरीदार और विक्रेता का सत्यापन करने के निर्देश भी दिए थे.

वहीं कानून पर राज्य के लोगों का कहना है कि बाहर से भारी मात्रा में जमीन खरीदने से न सिर्फ संसाधनों पर बोझ बढ़ा, बल्कि स्थानीय पहचान भी खतरे में पड़ी. अब सरकार ने इस चिंता को दूर किया है. यह कानून राज्य में हो रहे डेमोग्राफिक चेंज को भी रोकेगा. बहरहाल, यह उत्तराखंड के भविष्य को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. उत्तराखंड में यह एक नई शुरुआत है जहां विकास और विरासत साथ-साथ चलेंगे.


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