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‘न इस्लाम का हिस्सा, न कुरान में जिक्र…’ खतना प्रथा पर ‘सुप्रीम’ सख्ती, कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम समुदाय में बच्चियों पर खतना की खतरनाक प्रथा को बैन करने की मांग पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया. SC ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा गया है. याचिका में कहा गया, बच्चियों पर मजबूरन यह दर्दभरी प्रक्रिया लागू की जाती है.

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30 Nov 2025
( Updated: 11 Dec 2025
04:38 AM )
‘न इस्लाम का हिस्सा, न कुरान में जिक्र…’ खतना प्रथा पर ‘सुप्रीम’ सख्ती, कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस

मुस्लिम बच्चियों की खतरनाक खतना प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) रोक लगाने की तैयारी कर रहा है. मुस्लिम दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित खतना पर प्रतिबंध की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जल्द सुनवाई करेगा. कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ-साथ कानून और न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. 

खतना प्रथा के खिलाफ एक NGO चेतना वेलफेयर सोसायटी ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी. जिस पर कोर्ट सुनवाई के लिए सहमत हो गया है. जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की बेंच ने NGO की याचिका पर केंद्र और बाकी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है. 

खतना के खिलाफ याचिका में क्या कहा गया? 

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशि किरण और अधिवक्ता साधना संधू ने दलील दी. उन्होंने कोर्ट में कहा, महिला खतना न तो इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है और न ही किसी धार्मिक ग्रंथ में इसका स्पष्ट उल्लेख है. इसके बावजूद बच्चियों पर मजबूरन यह प्रक्रिया लागू की जाती है, जिससे उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान झेलना पड़ता है. जैसे- संक्रमण, प्रसव संबंधी जटिलताएं, दीर्घकालिक दर्द, और कई गंभीर स्वास्थ्य जोखिम. 

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याचिका में यह भी कहा गया कि यह प्रथा बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करती है. याचिकाकर्ताओं ने POCSO एक्ट का हवाला देते हुए कहा, POCSO एक्ट के तहत किसी नाबालिग के प्राइवेट पार्ट को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना कानून का उल्लंघन है. याचिकाकर्ता ने कहा, भारत में महिला खतना पर रोक लगाने के लिए कोई स्वतंत्र कानून मौजूद नहीं है. हालांकि भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 113, 118(1), 118(2), और 118(3) इस तरह की शारीरिक क्षति को अपराध मानती हैं. 

कोर्ट में यह भी बताया गया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी महिला खतना को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन करार दिया है. WHO, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां और वैश्विक मानवाधिकार संगठन लगातार देशों से महिला खतना को रोकने, अपराध घोषित करने और खत्म करने की अपील करते रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने खतना पर सुनवाई में क्या कहा? 

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे बच्चों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मामला बताया. कोर्ट ने कहा, इस मामले को गंभीरता से देखा जाना चाहिए. 

इससे पहले पूर्व CJI बीआर गवाई ने भी इस्लाम में खतने की प्रथा को लेकर चिंता जताई थी. उन्होंने कहा था, संविधान में अधिकार मिलने के बाद बी देश में बेटियों का FGM (Female Genital Mutilation) यानी खतना हो रहा है. बी आर गवई ने कहा था कि कोर्ट FGM के साथ ही सबरीमाला, पारसी समुदाय में अदियारी और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रति कथित भेदभाव को लेकर सुनवाई कर रहा है. 

क्या होती है खतना प्रथा? 

मुस्लिम समुदाय दाऊदी बोहरा में 75% बच्चियों का खतना होता है. यह एक रूढ़िवादी और खतरनाक प्रथा है. जिसमें खतना की प्रक्रिया में जननांग का एक हिस्सा काट दिया जाता है. कई जगह यह प्रथा बैन है. इस पर सजा का भी प्रावधान है. ऐसे में प्लास्टिक सर्जरी के बहाने भी खतना करवाया जाता है. इसमें कमी तो आई है लेकिन चोरी-छिपे अभी भी खतना हो रहा है. बच्चियों का खतना करवाने के पीछे सोच ये भी होती है कि बिना खतना वह (महिलाएं) शुद्ध नहीं होती हैं. 

दाऊदी बोहरा समुदाय भारत में यह FGM को ‘खतना’ नाम से प्रचलित रूप में अपनाता है. कुरान में खतना का कहीं जिक्र नहीं है लेकिन दाऊदी बोहरा समुदाय के विशेष ग्रंथ दैम-उल-इस्लाम में इसका समर्थन किया गया है. 

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भारत में इस तरह की प्रथा के खिलाफ कई बार चिंता जताई गई है. मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. NGO ने कोर्ट से गुहार लगाते हुए इस पर तुरंत रोक की मांग की है. याचिकाकर्ताओं ने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कई अफ्रीकी देशों का हवाला दिया है. जहां खतना को पूरी तरह बैन कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर केस की सुनवाई शुरू कर दी है. 

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