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जेल में ही रहेंगे उमर खालिद-शरजील इमाम… सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, एक साल तक नहीं कर सकेंगे बेल की अपील

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप बनता है. कार्यवाही के इस चरण में उन्हें जमानत पर रिहा करने का आधार नहीं बनता.

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05 Jan 2026
( Updated: 05 Jan 2026
06:59 AM )
जेल में ही रहेंगे उमर खालिद-शरजील इमाम… सुप्रीम कोर्ट की दो टूक,  एक साल तक नहीं कर सकेंगे बेल की अपील

दिल्ली दंगे (Delhi Riots) के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से सुप्रीम कोर्ट ने इंकार कर दिया. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने ये फैसला सुनाया. हालांकि कोर्ट ने अन्य 5 आरोपियों को जमानत दे दी गई है. SC नेे सख्त लहजे मेें कहा, उमर और शरजील एक साल तक इस मामले में जमानत याचिका दाखिल नहीं कर सकते हैं. 

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 10 दिसंबर को दिल्ली दंगे के आरोपियों की जमानत पर फैसला सुरक्षित रख लिया था. इनमें से गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी गई है. कोर्ट ने इनके लगातार कारावास को जरूरी नहीं मानते हुए 12 शर्तों के साथ जमानत दी. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप बनता है. कार्यवाही के इस चरण में उन्हें जमानत पर रिहा करने का आधार नहीं बनता. 

दिल्ली दंगों पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में क्या हुआ? 

जिन पांच आरोपियों को जमानत मिली है उन्हें लेकर कोर्ट ने कहा कि अभियोजन और सबूतों के लिहाज से उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य 5 आरोपियों की तुलना में अलग है. कोर्ट ने कहा, कथित अपराधों में इन दोनों ( उमर-शरजील) की भूमिका मुख्य रही है. कोर्ट ने ये माना कि दोनों लंबी अवधि तक हिरासत में रहे लेकिन यह न तो संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है और न ही संबंधित कानूनों के तहत लगे वैधानिक प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करती है. 

दरअसल, कोर्ट में दोनों के लंबे समय तक जेल में रहने और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के बारे में दलीलें दी गईं थी. जिस पर कोर्ट ने यह टिप्पणी की. जजों ने कहा, यह कोर्ट संविधान और कानून के बीच अमूर्त तुलना नहीं कर रहा है. अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में एक खास जगह रखता है. ट्रायल से पहले जेल को सजा नहीं माना जा सकता. स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होगा. UAPA एक खास कानून के तौर पर उन शर्तों के बारे में एक कानूनी फैसला दिखाता है जिनके आधार पर ट्रायल से पहले जमानत दी जा सकती है. राज्य की सुरक्षा और अखंडता से जुड़े अपराधों का आरोप लगाने वाले मुकदमों में देरी तुरुप का पत्ता नहीं हो सकती. 

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया ने जिन आरोपियों को जमानत दी है उन पर भी साफ कहा, जमानत मिलने से उनके खिलाफ लगे आरोपों में कोई नरमी नहीं आती है. उन्हें करीब 12 शर्तों के साथ जमानत पर रिहा किया जाएगा. इनमें से किसी भी शर्ते का उल्लंघन करने पर जमानत रद्द की जा सकती है. 

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