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शंभू बॉर्डर पर जाकर किसानों के लिए झलका विनेश का दर्द, सच्चाई से वाकिफ नहीं

विनेश फोगाट ने किसानों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करते हुए कहा, "किसान अपने अधिकारों के लिए लंबे समय से यहां बैठे हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा अभी भी कम नहीं हुई है. मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मैं एक किसान परिवार में पैदा हुई. आपकी बेटी आपके साथ है. हमें अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना होगा, क्योंकि कोई और हमारे लिए नहीं आएगा.

शंभू बॉर्डर पर जाकर किसानों के लिए झलका विनेश का दर्द, सच्चाई से वाकिफ नहीं

देश में बांग्लादेश की तरह तख्तापलट की साजिश की खबरें लगातार आ रही हैं। बांग्लादेश के हालात देख कांग्रेस के बड़े नेता कह रहे हैं कि भारत में भी ऐसा हो सकता है। आंदोलनजीवी राकेश टिकैत का कहना है कि अगर 2021 में किसान लाल किले पर ना जाकर संसद की तरफ चले जाते, तो बांग्लादेश जैसा हाल हो सकता था। बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद अमेरिकन डिप्लोमैट अचानक भारत में एक्टिव हो गए हैं। वे उमर अब्दुल्ला, ओवैसी, चंद्रबाबू नायडू, और नीतीश कुमार के नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। इसके बाद पाकिस्तान-बांग्लादेश में तख्तापलट करवाने वाले डोनाल्ड लू को भारत में एक्टिव बताया जा रहा है। साथ ही महीनों से शंभू बॉर्डर पर बैठे किसान एक बार फिर से एक्टिव नजर आ रहे हैं। लंबे वक्त बाद राकेश टिकैत का सक्रिय होना अच्छा संकेत नहीं है। उपर से रेसलर विनेश फोगाट भी किसानों के धरने में पहुंची हैं। क्या यह महज संयोग है या भारत में तख्तापलट के लिए कोई प्रयोग?

हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर लंबे वक्त से किसानों का धरना चल रहा है और अब किसानों को बॉर्डर पर बैठे 200 दिन पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर किसानों द्वारा एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें विनेश फोगाट भी पहुंचीं। यहां विनेश का भव्य तरीके से स्वागत किया गया और फिर मंच से विनेश ने किसानों को संबोधित किया।

विनेश के वक्तव्य में कई खास बातें थीं, लेकिन चर्चा इस बात की है कि जब विनेश ने कहा कि हम जब अपनी मांगों के लिए आवाज उठाते हैं तो यह हर बार राजनीतिक नहीं होता। अब यह राजनीतिक है या नहीं, इस बात को तय कौन करेगा? मोदी तेरी कब्र खुदेगी, ये नारे इन्हीं किसानों के आंदोलन में लग चुके हैं। 11 महीनों तक दिल्ली को जाम रखा गया। उस दौरान हत्या, बलात्कार जैसे आरोप उन्हीं किसानों पर लगे जो लग्जरी गाड़ियों में बैठकर धरनों को अंजाम दे रहे थे। विदेशी फंडिंग के आरोप भी इन्हीं किसानों पर लगे हैं। लाल किले की प्राचीर से हिंदुस्तान के सम्मान को रौंदा गया। शंभू बॉर्डर पर पुलिस से टकराव करने वाले किसान असल किसान नहीं हो सकते।

बुलडोजर से लेकर पोकलेन मशीनें तैनात की गई थीं। हरियाणा की सरकार ने सभी फसलों पर एमएसपी देने का ऐलान किया है। आपका कहना है कि हर बार मांग राजनीतिक नहीं होती, तो कई बार होती है। बस दो सवालों का जवाब दीजिए: राहुल गांधी से किसान कहीं भी मिल सकते थे, लेकिन संसद में मिलना कैसे राजनीतिक नहीं है? संसद से देश की राजनीति चलती है। दूसरा सवाल, अमेरिकी डिप्लोमैट से मिलने के लिए किसान नेता क्यों गए? क्या वे यह नहीं कह सकते थे कि यह हमारे देश का मसला है, हम इसे सुलझा लेंगे? लेकिन ये कथित नेता जिनके चरण चंपक बने हुए हैं, उन्हीं की कथनी पर काम कर रहे हैं। हमें भूलना नहीं चाहिए कि देश में केरोसिन छिड़का हुआ है और बस चिंगारी लगाना बाकी है। राहुल का यह बयान कोई भूला नहीं है। अब मैं आपके विवेक पर छोड़ता हूं कि क्या राहुल गांधी जाति जनगणना, आरक्षण, और किसानों के मुद्दे को लेकर देश में आग लगाने की चिंगारी तैयार नहीं कर रहे हैं।

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