6 महीने पहले IMF Board से Subramanian का इस्तीफा, पाकिस्तान को लेकर भारत की सख्त चाल?
IMF में भारत के Executive Director Krishnamurthy Subramanian ने अपने कार्यकाल से 6 महीने पहले पद छोड़ दिया है। यह फैसला पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित IMF फंडिंग से पहले आया है, जिससे भारत पहले से असहमत रहा है। इस चुपचाप हुई विदाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या यह एक रणनीतिक कदम था?
04 May 2025
(
Updated:
10 Dec 2025
09:42 PM
)
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3 मई 2025 की सुबह IMF की वेबसाइट पर एक छोटा सा अपडेट आया. Executive Directors की लिस्ट में भारत, बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका के प्रतिनिधि के तौर पर Krishnamurthy Subramanian का नाम हट चुका था. उस जगह लिखा था—“Vacant”. यानि अब यह पद खाली है. लेकिन यह केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है. यह एक ऐसी ख़बर है, जिसने भारत की आर्थिक और रणनीतिक हलचलों को गहराई से छुआ, और ये सवाल उठाया कि आख़िर Subramanian ने कार्यकाल खत्म होने से 6 महीने पहले ही इस्तीफा क्यों दे दिया?
Subramanian का IMF कार्यकाल नवंबर 2022 में शुरू हुआ था. उन्हें भारत सरकार ने अगस्त 2022 में नामित किया था और तब से वे IMF बोर्ड के सदस्य थे, जो कि वैश्विक आर्थिक नीतियों को आकार देने वाला एक प्रमुख निकाय है. लेकिन अचानक 2 मई को उनका नाम वेबसाइट से हटा दिया गया. जिसके बाद 3 मई से उनका पद आधिकारिक रूप से खाली घोषित हो गया.
कौन हैं K Subramanian?
Krishnamurthy Subramanian कोई साधारण नौकरशाह नहीं हैं. वे 2018 से 2021 तक भारत सरकार के Chief Economic Adviser (CEA) रह चुके हैं. उन्होंने आर्थिक नीतियों को उदार, आधुनिक और वैश्विक दृष्टिकोण से जोड़ने का प्रयास किया था. उनके कार्यकाल में भारत ने कई बड़े आर्थिक फैसले लिए, जैसे COVID के दौरान राहत पैकेज, बैंकिंग सुधार और आत्मनिर्भर भारत योजना की बुनियाद. जब उन्हें IMF बोर्ड में भेजा गया, तो भारत की ओर से यह एक स्पष्ट संकेत था कि अब हम केवल घरेलू आर्थिक रणनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वैश्विक मंच पर भी नीति निर्धारण की भूमिका निभाना चाहते हैं. और वे उस भूमिका को बखूबी निभा भी रहे थे.
K Subramanian ने पद क्यों छोड़ा?
अब असली सवाल यही है. IMF ने उनके इस्तीफे पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है. न ही भारत सरकार की ओर से कोई सार्वजनिक बयान आया है. लेकिन जो घटनाएं उनके इस्तीफे के आसपास हुईं, वे एक गहरी कहानी कहती हैं.
पहली बात, 9 मई को IMF की बोर्ड मीटिंग होने जा रही है, जिसमें पाकिस्तान को मिलने वाली नई आर्थिक मदद पर फैसला लिया जाना है. भारत पहले से इस बात का विरोध करता आया है कि जब तक पाकिस्तान आतंकी फंडिंग को रोकने के लिए स्पष्ट क़दम नहीं उठाता, तब तक उसे IMF जैसी वैश्विक संस्था से मदद नहीं दी जानी चाहिए. Subramanian भी इस मुद्दे पर स्पष्ट मत रखते थे. इसी पृष्ठभूमि में, Subramanian का अचानक हट जाना सवाल पैदा करता है, क्या यह कोई रणनीतिक बदलाव है या फिर कोई राजनयिक दबाव?
क्या भारत अपनी रणनीति बदल रहा है?
कुछ जानकारों का मानना है कि भारत IMF में एक नए चेहरे को लाकर उस बैठक में और ज्यादा तीखे तरीके से पाकिस्तान के फंडिंग प्रस्ताव का विरोध करना चाहता है. क्योंकि IMF का नियम यह है कि EDs मतदान में भाग लेते हैं और अपने समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अगर Subramanian इस मुद्दे पर किसी कारणवश अनुपस्थित रहते या विरोध दर्ज नहीं कराते, तो यह भारत की नीति के खिलाफ होता.
इसलिए यह भी माना जा रहा है कि उनकी जगह कोई ऐसा व्यक्ति लाया जाएगा, जो भारत की सुरक्षा चिंताओं को और मुखरता से दुनिया के सामने रख सके.
Omaha सम्मेलन में Subramanian की अनुपस्थिति
2 मई को Subramanian को अमेरिका के Nebraska में एक बड़े सम्मेलन में शामिल होना था, जिसका आयोजन DoorDarshi Advisors द्वारा किया गया था. कार्यक्रम का नाम था “Investing Opportunities in India”. लेकिन कार्यक्रम से कुछ घंटे पहले आयोजकों ने सोशल मीडिया पर सूचना दी कि Subramanian “एक आपात स्थिति” के चलते इसमें भाग नहीं ले पाएंगे. क्या यह आपात स्थिति उनका इस्तीफा था? या फिर इसके पीछे कुछ और चल रहा था? यह अब तक साफ नहीं हो पाया है, लेकिन इस घटना ने पूरे मामले को और ज्यादा रहस्यमय बना दिया है.
वैसे आपको बता दें कि Subramanian से पहले इस पद पर Surjit Bhalla नियुक्त थे, जो नवंबर 2019 से लेकर 2022 तक IMF में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. उन्हें भी 2020 में दो साल के लिए दोबारा नियुक्त किया गया था. Bhalla को भी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों पर गहरी पकड़ और स्पष्ट विचारों के लिए जाना जाता है. अब देखना यह होगा कि क्या भारत एक बार फिर उन्हें बुला सकता है या किसी नए नाम को आगे लाएगा.
भारत के लिए क्या मायने रखता है यह पद?
IMF का Executive Director बनना केवल एक पद नहीं होता. यह एक शक्तिशाली स्थान होता है जहां आर्थिक सहायता, ऋण नीति, वित्तीय अनुशासन और विकासशील देशों के मुद्दों पर वोटिंग होती है. भारत जैसे देश के लिए यह वैश्विक शक्ति संतुलन का एक मंच होता है. IMF बोर्ड में भारत, बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका एक ही समूह में हैं. इस समूह की आवाज उठाना भारत की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में Subramanian का जाना केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं है. यह एक रणनीतिक मोड़ भी हो सकता है.
Krishnamurthy Subramanian का IMF से अचानक जाना एक साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं है. यह एक ऐसे समय में हुआ है, जब भारत वैश्विक मंच पर निर्णायक भूमिका निभा सकता था. पाकिस्तान को फंडिंग देने से रोकने की कोशिश, भारत की रणनीति, और नई नियुक्ति की प्रतीक्षा ये सारे कारक मिलकर यह कहानी बनाते हैं. अभी तक इस पूरी घटना पर न भारत सरकार ने कुछ बोला है और न ही IMF ने. लेकिन यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. असल खेल अब 9 मई को IMF की बैठक में दिखेगा जहां भारत यह तय करेगा कि वैश्विक मंच पर उसकी बात कितनी सुनी जाती है.
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