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रक्षाबंधन की पहली राखी किसने बांधी? महाभारत से मुगल काल तक फैली इस परंपरा का है रोचक इतिहास

रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक है, जिसका इतिहास पौराणिक और सांस्कृतिक दोनों रूपों में समृद्ध है. इसकी जड़ें इंद्र और इंद्राणी की कथा, महाभारत में द्रौपदी और श्रीकृष्ण की कहानी, तथा रानी कर्णावती और हुमायूं की लोककथा से जुड़ी हैं. यह पर्व सावन पूर्णिमा को मनाया जाता है और प्रेम, विश्वास व सुरक्षा का संदेश देता है.

रक्षाबंधन की पहली राखी किसने बांधी? महाभारत से मुगल काल तक फैली इस परंपरा का है रोचक इतिहास
रक्षाबंधन, जिसे आम बोलचाल में ‘राखी’ कहा जाता है, भारत के सबसे लोकप्रिय और भावनात्मक त्योहारों में से एक है. यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है, जिसमें बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और उसकी लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना करती है. भाई भी जीवनभर उसकी रक्षा करने का संकल्प लेता है. यह त्योहार हर साल सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और इसका इतिहास हजारों साल पुराना है.
 
पौराणिक युग में राखी की शुरुआत 
 
रक्षाबंधन का सबसे पुराना संदर्भ ‘भागवत पुराण’ और ‘भविष्य पुराण’ में मिलता है. एक कथा के अनुसार, असुरों और देवताओं के युद्ध में देवताओं के राजा इंद्र मुश्किल में पड़ गए. उनकी पत्नी इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन एक पवित्र धागे में मंत्र फूंककर उनकी कलाई पर बांधा. कहा जाता है कि उस धागे की शक्ति से इंद्र को विजय मिली. यह घटना दर्शाती है कि राखी केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं, बल्कि रक्षा और आशीर्वाद का प्रतीक है.
 
महाभारत की प्रसिद्ध कथा 
 
महाभारत में एक प्रसंग आता है जब श्रीकृष्ण शिशुपाल वध के दौरान घायल हो गए और उनकी उंगली से खून बहने लगा. यह देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया. इस छोटे से कार्य ने एक गहरा रिश्ता बना दिया. श्रीकृष्ण ने उस समय वचन दिया कि वे हर परिस्थिति में द्रौपदी की रक्षा करेंगे. यही कारण है कि चीर-हरण के समय श्रीकृष्ण ने चमत्कार कर उनकी लाज बचाई.
 
इतिहास और लोककथा का फर्क
 
लोककथाओं में यह भी सुनने को मिलता है कि 16वीं शताब्दी में चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने बहादुर शाह के हमले से पहले मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी थी और उनसे रक्षा की गुहार लगाई थी. कहा जाता है कि हुमायूं ने इस रिश्ते का सम्मान करते हुए उनकी मदद की. हालांकि, इतिहासकारों के अनुसार इस घटना का ठोस प्रमाण नहीं मिलता और इसे अधिकतर रोमांटिक लोककथा माना जाता है.
 
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
 
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व नहीं है, बल्कि इसमें एक आध्यात्मिक अर्थ भी छिपा है. रक्षा सूत्र को शुभ और सुरक्षात्मक माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, राखी बांधते समय “येन बद्धो बली राजा…” मंत्र का उच्चारण किया जाता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और रिश्तों में सकारात्मकता आती है.
 
अलग-अलग राज्यों में रक्षाबंधन की अलग परंपराएं
 
भारत के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है.
  • गुजरात में इसे ‘पवित्रोपण’ कहा जाता है और भगवान शिव की पूजा की जाती है.
  • महाराष्ट्र और गोवा में यह ‘नारियल पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है, जिसमें समुद्र को नारियल अर्पित किया जाता है.
  • दक्षिण भारत में ब्राह्मण ‘अवनी अवित्तम’ के दिन यज्ञोपवीत बदलते हैं.
  • पूर्वी भारत में ‘सलानो’ के रूप में यह पर्व पड़ोसियों और दोस्तों तक के रिश्तों को मजबूत करने का अवसर बन जाता है.
बदलते समय में राखी का स्वरूप
 
आज के दौर में राखी का स्वरूप बदल चुका है. अब बाजारों में डिजाइनर, कस्टमाइज्ड और पर्यावरण-हितैषी राखियां उपलब्ध हैं. साथ ही, यह त्योहार केवल भाई-बहन तक सीमित न रहकर दोस्ती, पड़ोसी और सामाजिक रिश्तों में भी मनाया जाने लगा है. यहां तक कि कई बहनें अपने भाई की रक्षा के साथ-साथ खुद भी उनके लिए संकल्प लेती हैं, जो रिश्ते में बराबरी का भाव दर्शाता है.
 
एक धागा, हजारों साल का इतिहास
 
रक्षाबंधन का इतिहास पौराणिक युग से लेकर आज तक फैला हुआ है. चाहे वह इंद्राणी और इंद्र की कथा हो, द्रौपदी और श्रीकृष्ण का वचन, या फिर रानी कर्णावती की लोककथा – हर कहानी में एक बात समान है, और वह है विश्वास और सुरक्षा का बंधन. यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि एक साधारण-सा धागा भी भावनाओं, जिम्मेदारियों और प्रेम को जोड़ सकता है.

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