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8 नवंबर को होगा छठ पूजा का समापन, जानिए क्या हैं विधि-विधान

छठ पूजा का समापन एक विशेष विधि-विधान के साथ किया जाता है, जिसमें उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत समाप्त किया जाता है। चार दिन तक चलने वाली यह पूजा प्रकृति, सूर्य देवता और छठी मैया की आराधना का पर्व है, जिसे पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। 2024 में छठ पूजा का समापन 8 नवंबर को होगा।

8 नवंबर को होगा छठ पूजा का समापन, जानिए क्या हैं विधि-विधान
छठ पूजा, जिसे सूर्यषष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है और बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत भारत के अन्य हिस्सों में बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है, जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में आता है। हर साल की तरह इस साल भी धूम धाम से छठ मनाया जा रहा है, और इस पवित्र त्यौहार छठ पूजा का समापन 8 नवंबर को होगा। इस दौरान भक्त उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी पूजा का समापन करेंगे।


छठ पूजा के समापन का क्या है महत्व


छठ पूजा के अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने की विशेष परंपरा होती है। मान्यता है कि भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और व्रत करने वाले के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। यह पूजा मानव जीवन में अनुशासन, परिश्रम और संयम का महत्व सिखाती है, और समापन के समय भक्तों को विशेष लाभ मिलता है। इसे व्रत का 'पारण' भी कहा जाता है, जो चार दिनों के इस कठिन तपस्या का समापन करता है।

छठ पूजा का समापन कब और कैसे करें?

छठ पूजा का समापन उषा अर्घ्य, यानी सुबह-सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है। इसका समय सूर्योदय से कुछ पहले का होता है, जब भक्तजन नदी या तालाब के किनारे पहुंचते हैं। और वहाँ पूजा का संपूर्ण आयोजन किया जाता है, जिसमें दिया जलाना, प्रसाद सजाना और सूर्य देव का आह्वान किया जाता है।

विधि-विधान से छठ पूजा का करें समापन - 

प्रातःकाल की तैयारी: व्रती और परिवार के सदस्य सुबह-सुबह उठकर शुद्ध होकर पूजा स्थल पर पहुंचते हैं। वहाँ गंगा या किसी पवित्र जल स्रोत के किनारे अपने थाल और पूजा सामग्री के साथ एकत्र होते हैं।

सूर्य को जल अर्पित करना: भक्त हाथों में दूध और गंगा जल से भरा कलश लेकर सूर्य देव की ओर मुख करके अर्घ्य देते हैं। सूर्य को जल अर्पित करते समय सूर्य मंत्र का जाप किया जाता है। यह अर्घ्य उगते सूर्य के समय दिया जाता है, और यह छठ पूजा का मुख्य अनुष्ठान माना जाता है।

प्रसाद का वितरण: सूर्य को अर्घ्य देने के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है। प्रसाद में ठेकुआ, गन्ना, और फलों का विशेष महत्व है। यह प्रसाद पहले सूर्य देव को अर्पित किया जाता है और फिर लोगों को बांटा जाता है।कहा जाता है कि प्रसाद को सभी के बीच बांटना पुण्य का कार्य माना जाता है।

व्रत का पारण: अर्घ्य और प्रसाद वितरण के बाद जो लोग व्रत रखते हैं वों अपने व्रत का पारण करते हैं, जो व्रत का समापन होता है। पारण में व्रती प्रसाद के रूप में खिचड़ी, दूध, और मीठे पकवान ग्रहण करते हैं, परिवार के सदस्य भी इसके साथ भोजन करते हैं।

36 घंटे के निर्जल व्रत की क्या है विशेषता -

छठ पूजा का व्रत कठिन तपस्या का प्रतीक माना जाता है। इसमें 36 घंटे का निर्जल उपवास किया जाता है, जिसमें न तो व्रत रखने वाला व्यक्ति कुछ खाता है और न ही पानी पीता है। इस कठिन उपवास के दौरान श्रद्धा और संयम से पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से शुद्धि प्राप्त होती है, और उसकी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

परिवार के साथ करें प्रसाद  ग्रहण - 

छठ पूजा के व्रत का समापन करते समय परिवार के साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिए जो अक्सर लोग करते भी हैं। इस प्रसाद में ठेकुआ, खिचड़ी, चने की दाल, और कद्दू की सब्जी विशेष रूप से बनाई जाती है। इसे ग्रहण कर व्रत रखने वाले के अपने इस कठिन तपस्या का समापन करते हैं और परिवार वालों के बीच प्रसाद का वितरण करते हैं।

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