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62 साल बाद इंडियन एयरफोर्स से MiG-21 की होगी विदाई, जानिए इस सुपरसोनिक जेट को क्यों कहते हैं 'फ्लाइंग कॉफिन'

भारतीय वायुसेना (IAF) अपने सबसे पुराने, ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित लड़ाकू विमान मिग-21 को औपचारिक रूप से सेवा से विदा देने जा रही है. यह एक युग के अंत जैसा है. तो चलिए जानते हैं कि IAF से जुड़ी मिग-21 की पूरी कहानी

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22 Jul 2025
( Updated: 11 Dec 2025
08:20 AM )
62 साल बाद इंडियन एयरफोर्स से MiG-21 की होगी विदाई, जानिए इस सुपरसोनिक जेट को क्यों कहते हैं 'फ्लाइंग कॉफिन'

19 सितंबर 2025 को भारतीय वायुसेना (IAF) अपने सबसे पुराने, ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित लड़ाकू विमान मिग-21 को औपचारिक रूप से सेवा से विदा देने जा रही है. यह विदाई समारोह चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित होगा, जहां 23 स्क्वाड्रन (पैंथर्स) मिग-21 को अंतिम सलामी देगा. 1963 में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ मिग-21 न केवल भारत का पहला सुपरसोनिक जेट फाइटर था, बल्कि यह विमान 62 वर्षों तक देश की हवाई सुरक्षा और सामरिक शक्ति की रीढ़ बना रहा. इसने 1965, 1971, कारगिल युद्ध और बालाकोट स्ट्राइक जैसे कई अहम मौकों पर अपनी उपयोगिता सिद्ध की. अब, तकनीकी विकास और आधुनिक ज़रूरतों को देखते हुए मिग-21 को सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त किया जा रहा है. यह एक युग के अंत जैसा है.

उम्र और बार-बार होने वाले हादसों की वजह से इसे 'उड़ता ताबूत' भी कहा जाने लगा. अब इसके रिटायर होने से वायुसेना की ताकत 29 स्क्वाड्रनों तक सिमट जाएगी, जो 1965 के युद्ध के समय से भी कम है. आइए, समझते हैं कि मिग-21 की कहानी क्या है. इसे क्यों रिटायर किया जा रहा है. और तेजस Mk1A की देरी ने क्या मुश्किलें खड़ी की हैं.
भारत का पहला सुपरसोनिक जेट है मिग-21

1963 में IAF में शामिल हुआ था मिग-21
मिग-21 सोवियत यूनियन (अब रूस) का बनाया हुआ लड़ाकू विमान था, जिसे 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया. ये भारत का पहला सुपरसोनिक जेट था, यानी ये ध्वनि की गति से तेज उड़ सकता था. उस समय ये विमान भारत की हवाई ताकत का प्रतीक था. 874 मिग-21 विमानों को वायुसेना में शामिल किया गया, जिनमें से करीब 600 भारत में ही बनाए गए. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने इनका लाइसेंस्ड प्रोडक्शन किया. 

जानते हैं कि मिग-21 ने किन-किन बड़े युद्धों में हिस्सा लिया... 
1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध: मिग-21 ने पहली बार जंग में हिस्सा लिया. पाकिस्तानी विमानों को टक्कर दी. 
1971 का युद्ध: पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की आजादी में मिग-21 ने अहम भूमिका निभाई. इसने पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक हमले किए. 
1999 का कारगिल युद्ध: रात में उड़ान भरकर दुश्मन की ताकत को तोड़ा. उस समय पायलट्स ने साधारण जीपीएस और स्टॉपवॉच के सहारे हमले किए.
2019 का बालाकोट हमला: मिग-21 बाइसन ने पाकिस्तानी F-16 को मार गिराया. ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वर्तमान ने मिग-21 उड़ाकर ये कारनामा किया. 
2025 का ऑपरेशन सिंदूर: पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में मिग-21 ने आखिरी बार हिस्सा लिया.
पर अब वक्त बीतने के साथ मिग-21 पुराना हो गया है. इसका आखिरी वर्जन, मिग-21 बाइसन, 2000 में अपग्रेड किया गया, जिसमें नया रडार, मिसाइल्स और हेलमेट-माउंटेड साइट्स जोड़े गए. फिर भी, इसकी उम्र और डिजाइन की कमियां सामने आईं. 

मिग-21 से जुड़ी दुर्घटनाएं, क्या रही वजह?
भारतीय वायुसेना के सबसे लंबे समय तक सेवा में रहे लड़ाकू विमान मिग-21 का रिकॉर्ड शुरुआती वर्षों में शानदार रहा, लेकिन बीते कुछ दशकों में लगातार हुए हादसों ने इसकी छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया.
आंकड़ों पर नजर डालें तो:
- बीते 60 वर्षों में 400 से अधिक मिग-21 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं.
- इन हादसों में 200 से अधिक पायलटों ने अपनी जान गंवाई.
- 2010 के बाद भी 20 से अधिक मिग-21 विमान क्रैश हो चुके हैं.


इन दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण:
1. पुराना डिज़ाइन:
मिग-21 को 1950–60 के दशक की तकनीक के अनुसार डिजाइन किया गया था. बदलते दौर और आधुनिक युद्धक जरूरतों के सामने इसकी क्षमताएं सीमित हो गईं.

2. रखरखाव की जटिलताएं:
पुराने पुर्जों की उपलब्धता और तकनीकी जटिलताओं के कारण इसका मेंटेनेंस महंगा और मुश्किल होता गया.

3. पायलट की त्रुटि:
कुछ मामलों में हादसे ट्रेनिंग की कमी या पायलट की मानवीय गलती के चलते हुए.

4. बर्ड स्ट्राइक:
उड़ान के दौरान पक्षियों से टकराने की घटनाएं भी कई दुर्घटनाओं की वजह बनीं.

मिग-21 को ’फ्लाइंग कॉफिन' का दिया गया नाम
लगातार होते हादसों के कारण मिग-21 को ‘फ्लाइंग कॉफिन’ या ‘उड़ता ताबूत’ कहा जाने लगा. इसकी छवि पर इतने वर्षों में लगे दागों को हटाना मुश्किल रहा. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय वायुसेना के पास मिग-21 की संख्या काफी अधिक (करीब 874 विमान) रही है, इसलिए हादसों की संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक लगती है. फिर भी, इसके पुराने डिजाइन, तकनीकी सीमाओं, और सुरक्षा चिंताओं ने इसे रिटायर करने का फैसला आवश्यक और अपरिहार्य बना दिया.

सेवा से विदाई की योजना:
भारतीय वायुसेना ने 2025 तक सभी मिग-21 को चरणबद्ध रूप से रिटायर करने का निर्णय लिया है. कभी मिग-21 के चार स्क्वाड्रन (लड़ाकू इकाइयाँ) सक्रिय थे, लेकिन अब इनमें से सिर्फ दो स्क्वाड्रन ही शेष हैं. 19 सितंबर 2025 को 23 स्क्वाड्रन (पैंथर्स) के साथ मिग-21 की अंतिम विदाई चंडीगढ़ एयरबेस पर एक विशेष समारोह में की जाएगी. भारतीय वायुसेना की ऐतिहासिक मिग-21 श्रृंखला धीरे-धीरे अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. नंबर 4 स्क्वाड्रन (उरियल्स) और नंबर 51 स्क्वाड्रन (स्वॉर्ड आर्म्स) को 2022–23 में पहले ही सेवानिवृत्त कर दिया गया था.

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अब वायुसेना के पास मिग-21 के 26 से 31 बाइसन वेरिएंट शेष हैं, जिन्हें 2025 के अंत तक पूरी तरह से रिटायर कर दिया जाएगा. इसका अंतिम प्रतीकात्मक समारोह चंडीगढ़ एयरबेस पर 23 स्क्वाड्रन (पैंथर्स) द्वारा आयोजित किया जाएगा, जो मिग-21 की आखिरी उड़ान को दर्शाएगा.मिग-21 को LCA तेजस Mk1A से रिप्लेस करने की योजना थी. तेजस भारत का स्वदेशी लड़ाकू विमान है, जिसे HAL और ADA (एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी) ने बनाया. लेकिन तेजस की डिलीवरी में देरी ने मिग-21 को लंबे समय तक उड़ाने के लिए मजबूर किया. 

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