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गोद से छीन ली 7 महीने की बच्ची… 5 साल से दर-दर भटक रही मां, अब PM मोदी ने की जर्मनी से बात, रंग लाएगी मुहिम!
5 साल होने को आए एक मां अपनी ही बच्ची के लिए संसद से जर्मनी की अदालतों के चक्कर काट रही है. अरिहा की कस्टडी पर अब PM मोदी ने भी चिंता जताते हुए जर्मन चांसलर से बात की है.
सात समुद्र पार एक मां जो अपनी बच्ची के लिए 5 साल से इंतजार कर रही है. उस मां से बच्ची को जन्म के 7 महीने बाद ही दूर कर दिया गया था. मां का कुसूर केवल इतना था कि बच्ची को चोट लगने के बाद वह उसे हॉस्पिटल लेकर चली गई. अब आप कहेंगे, अपनी बच्ची का इलाज करवाना कुसूर कैसे? ये तो बच्ची के लिए एक मां की फिक्र और ममता है, लेकिन विदेशी धरती पर ये ममता ही उस मां की दुश्मन बन गई.
ये दर्दभरी कहानी है गुजरात के धरा शाह और भावेश शाह की. जिनसे जर्मनी में उनकी सात महीने की बच्ची अरिहा छीन ली गई थी. उनकी बच्ची जर्मनी के फोस्टर केयर में बड़ी हो रही है, लेकिन वहां खुद के नहीं बल्कि सरकारी मां बाप के बीच है. जबकि असली माता-पिता भारत में संसद से लेकर सरकार तक बेटी को वापस पाने के लिए भटक रहे हैं. अब खुद PM मोदी ने धरा शाह के दर्द को जर्मन चांसलर के सामने रखा, लेकिन जर्मन कानून के आगे बच्ची की भारत वापसी में मुश्किलें आ रही हैं.
जर्मनी में छिन गई सारी खुशियां
पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर भावेश शाह साल 2018 में पत्नी धरा के साथ जर्मनी में शिफ्ट हो गए थे. बर्लिन में अच्छी नौकरी, अच्छी लाइफस्टाइल के बीच साल 2021 में धरा एक बच्ची की मां बनी. जिसका नाम रखा अरिहा. अरिहा जैसे दोनों की जिंदगी में नई बहार बनकर आई हो. सब कुछ ठीक चल रहा था कि अरिहा को लगी एक चोट ने धरा और भावेश कि जिंदगी को गहरा घाव दे दिया.
एक दिन अरिहा की नानी जब बच्ची को खिला रही थी. खेलते समय अचानक अरिहा को चोट लग गई. मां धरा को चोट के बारे में तब चला जब उसने डायपर बदलते समय उसमें खून लगा देखा. धरा घबरा गई, वह पति के साथ बच्ची को लेकर अस्पताल भागी, लेकिन यहां इलाज की बजाय मां-बाप को ही शक की निगाहों से देखा गया. चूंकि डायपर में खून लगा था और चोट प्राइवेट पार्ट के आस-पास लगी थी. इससे हॉस्पिटल वालों को सेक्सुअल असॉल्ट का शक हुआ. बच्ची को तुरंत बड़े हॉस्पिटल रेफर किया गया. जहां से बच्ची की कस्टडी मां बाप से लेकर जर्मनी की चाइल्ड प्रोटेक्शन एजेंसी ‘यूगेंडम्ट’ को दे दी. उस वक्त धरा और भावेश के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई हो. अपनी ही बच्ची को वापस पाने के लिए अब उन्हें कानूनी लड़ाई शुरू करनी पड़ी.
यौन शोषण के आरोप से राहत लेकिन नहीं लौटाई बच्ची
जर्मन पुलिस ने मामले की जांच की, बच्ची का मेडिकल टेस्ट से लेकर DNA टेस्ट हुआ, जिसमें यौन शोषण की आशंकाओं को खारिज कर दिया गया. यानी पुलिस इनवेस्टिगेशन और मेडिकल जांच में साफ हो गया था कि बच्ची के साथ किसी तरह का यौन शोषण नहीं हुआ. इसके बाद पुलिस ने मां-बाप के खिलाफ क्रिमिनल केस तो बंद कर दिया, लेकिन चाइल्ड लाइन सर्विस ने उन्हें बच्ची वापस नहीं लौटाई.
एजेंसी ने केस की दिशा ही मोड़ दी और कोर्ट में मां-बाप के खिलाफ एक नया सिविल केस दायर कर दिया. चाइल्ड लाइन सर्विस ने तर्क दिया, भले ही अरिहा के साथ यौन शोषण नहीं हुआ, लेकिन माता-पिता ने बच्ची के साथ ‘हिंसक व्यवहार’ किया है या वे उसकी देखभाल करने में लापरवाही बरत रहे हैं. बच्ची को लगी चोट मां बाप की इसी लापरवाही का नतीजा है. चाइल्ड लाइन की इस दलील पर कोर्ट ने धरा और भावेश से उनका पैरेंटिंग राइट यानी माता-पिता होने का हक ही छीन लिया. यानी जिस मां ने बच्ची को जन्म दिया है वो कानूनी रूप से उसकी मां मानी ही नहीं जाएगी. अरिहा को धरा और भावेश से छीनकर बर्लिन के देखभाल केंद्र में भेज दिया गया.
अरिहा अभी बर्लिन के फोस्टर केयर सेंटर में ही है. अब वह 5 साल की हो गई है. उसकी पढ़ाई लिखाई भी शुरू हो गई है. जर्मन कल्चर और भाषा सीख रही है. जबकि वह एक गुजराती जैन परिवार की बेटी है, लेकिन अरिहा की न केवल असली पहचान खो रही है बल्कि उससे उसके सगे मां-बाप का प्यार भी दूर कर दिया गया है.
संसद में उठा अरिहा की वापसी का मुद्दा
धरा शाह का कहना है कि किसी भी देश का कानून एक बच्ची को मां से अलग कैसे कर सकता है? जर्मनी की अदालतों ने तमाम दलीलों के बाद भी धरा की एक नहीं सुनी. निराश दंपत्ति भारत लौटा और यहां भारत सरकार से मदद मांगी. कई महिला सांसदों ने धरा का दर्द समझा और अरिहा की वापसी का मुद्दा उठाया. इन सांसदों में सपा MP जया बच्चन भी शामिल है. उन्होंने सदन से इस मसले पर गंभीर कदम उठाने की मांग की.
एक तो जर्मन कानून की जटिलता ऊपर से चाइल्ड केयर और जर्मन अदालतों का नया तर्क. ये मामला मुश्किल होता गया. अब नया पेंच ये है कि जर्मनी में बच्चों का अधिकार मां-बाप के अधिकार से ऊपर माना जाता है. कोर्ट का तर्क है कि पांच साल की अरिहा अब जर्मनी के माहौल में ढल गई है. उसका भारत में रहना मुश्किल होगा. भारतीय खाने से लेकर यहां की जलवायु तक का बच्ची पर उल्टा असर हो सकता है.
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हालांकि इस पर भारत ने तर्क दिया है कि अरिहा पहले भारतीय है और उसे यहां की संस्कृति और माहौल में रहने का अधिकार है, लेकिन जर्मन कोर्ट यह बात समझने को तैयार नहीं है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि अरिहा बालिग होने तक जर्मनी में ही रहेगी.
PM मोदी ने किया हस्तक्षेप, दिखी उम्मीद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच गुजरात के गांधीनगर में द्विपक्षीय वार्ता हुई. जिसमें उन्होंने बेबी अरिहा के मुद्दे को बहुत गंभीरता से उठाया. विदेश सचिव ने बताया कि इस बेहद संवेदनशील और मानवीय मामले को लेकर भारत सरकार गंभीर है और जर्मनी पर दबाव बना रही है. सरकार ने जर्मनी को यह आश्वासन दिया है कि मां-बाप पर भरोसा नहीं तो बच्ची की देखरेख भारत सरकार करेगी. सरकार का यह विकल्प अरिहा की वापसी को आसान कर सकता है. सरकार की पूरी कोशिश है कि भारतीय बच्ची अरिहा अपने देश लौटे. इसके लिए PM मोदी खुद कूटनीतिक विकल्प रख रहे हैं.
मामले में अब PM मोदी के दखल के बाद धरा और भावेश को उम्मीद है कि बच्ची उनके पास लौटेगी. यह मुद्दा न केवल एक मां के दर्द का है बल्कि एक भारतीय नागरिक के हितों का भी है. जिसे उसके देश, संस्कृति और मूल जड़ों से दूर कर दिया गया. अब देखना होगा केंद्र सरकार का ये कूटनीतिक दबाव बेबी अरिहा की वापसी में कितना मददगार साबित होगा?
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