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काश! देश का विपक्ष मायावती की तरह सोचता, मोदी विरोध के नाम पर कर रहे भारत का विरोध, बसपा सुप्रीमो ने दे डाली नसीहत
अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ वार के बीच मायावती ने देश के विपक्षी दलों को तगड़ी नसीहत दी है. उन्होंने बीचे दिनों अपने ट्वीट में साफ कर दिया कि मुद्दा मोदी नहीं हैं, देश है इस लिए ओछी राजनीति छोड़ राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें.
अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाए जाने के फैसले ने न केवल दोनों देशों के संबंधों में खटास घोली है, बल्कि भारत की आंतरिक राजनीति में भी हलचल मचा दी है। यह टैरिफ खास तौर पर रूस से तेल खरीद और अन्य व्यापारिक गतिविधियों को लेकर लगाया गया है, जिसे भारत सरकार ने अन्यायपूर्ण और अनुचित बताया है। हालांकि इस गंभीर मुद्दे पर जहां देश को एकजुट होकर प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता थी, वहीं कांग्रेस सहित विपक्ष के एक धड़े ने इसे आपदा में अवसर के तौर पर लिया और बिना वक्त गवांए सरकार पर तीखा हमला बोला. शायद ये लोग विरोध के चक्कर में कब देश की आलोचना करने लगे, इन्हें पता ही नहीं चला.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कदम भारत के लिए एक आर्थिक झटका के तौर पर लिया जा रहा है। इससे पहले अमेरिका, भारत के साथ व्यापार और सामरिक सहयोग का एक मजबूत रिश्ता बनाए रखने का दावा करता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में ट्रंप की विदेश नीति ने बार-बार भारत को ऐसे मोड़ों पर खड़ा कर दिया है, जहां उसे अपने आत्मसम्मान और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ा है। यह टैरिफ भी उसी नीति का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका अपने मित्र देशों से भी एकतरफा फैसलों के जरिए व्यवहार कर रहा है।
राहुल गांधी ने ट्रंप की धमकी और ब्लैकमेल को अडानी समूह से जोड़ दिया
इस टैरिफ के ऐलान के तुरंत बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर तीखा हमला किया। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि ट्रंप का यह फैसला एक तरह का आर्थिक ब्लैकमेल है और प्रधानमंत्री मोदी को अपनी कमजोरी को देश के हितों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने इसे अडानी समूह पर अमेरिका में चल रही जांच से भी जोड़ दिया और यह दावा किया कि प्रधानमंत्री ट्रंप की धमकियों के सामने मजबूर हैं क्योंकि उनके हाथ बंधे हुए हैं। राहुल गांधी के इन ट्वीट्स से यह संकेत गया कि कांग्रेस इस अंतरराष्ट्रीय संकट को भी घरेलू राजनीति में भुनाने का प्रयास कर रही है।
काश! मायावती से सीख पाते राहुल गांधी
हालांकि इसी बीच एक ऐसी राजनीतिक आवाज सामने आई, जिसने पूरे देश को चौंका दिया। यह आवाज थी बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती की। मायावती ने अपने ट्वीट में न सिर्फ अमेरिका के फैसले की निंदा की बल्कि एक बेहद संतुलित और परिपक्व राजनीतिक दृष्टिकोण भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने संयमित प्रतिक्रिया देकर इस टैरिफ को अनुचित, अन्यायपूर्ण और अविवेकी करार दिया है, लेकिन इस समय देश को पूरी एकजुटता के साथ काम करने की आवश्यकता है।
मायावती ने अमेरिकी विश्वासघात पर लिया सख्त स्टैंड
मायावती ने कहा कि अमेरिका ने भारत पर यह आर्थिक आघात पहुंचाकर मित्रता की भावना को ठेस पहुंचाई है और यह भारत की जनता के लिए विश्वासघात जैसा है। उन्होंने विपक्ष और सत्ता दोनों से आग्रह किया कि वे अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थों को किनारे रखकर इस चुनौती से निपटने के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति के तहत एकजुट होकर काम करें। उनके अनुसार, इस समय देश को कानून व्यवस्था, अमन-चैन और आर्थिक स्थिरता की सख्त जरूरत है, जिसके लिए राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर देशहित को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
मायावती ने ओछी राजनीति की जगह देश को प्राथमिकता देने की वकालत की
मायावती यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने सुझाव दिया कि इस गंभीर मुद्दे पर संसद में खुलकर चर्चा होनी चाहिए ताकि सभी दल मिलकर एक स्पष्ट और सामूहिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने आंतरिक मुद्दों में उलझी रहेंगी और एक-दूसरे के खिलाफ अविश्वास का माहौल बनाए रखेंगी तो इस तरह की चुनौतियों से निपटना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बहुजन समाज पार्टी की राजनीति हमेशा से सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय की भावना पर आधारित रही है और यही समय की मांग भी है।
राष्ट्रहित के मुद्दों पर मायावती सबसे आगे
मायावती की यह प्रतिक्रिया न केवल उनके राजनीतिक अनुभव को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि वे जब चाहें, राष्ट्रहित में सबसे संतुलित और जिम्मेदार नेतृत्व प्रस्तुत कर सकती हैं। जब कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी पार्टी एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे को राजनीतिक हथियार में बदलने की कोशिश कर रही है, तब मायावती जैसी नेता उस समय एक परिपक्व राष्ट्रनेता की तरह व्यवहार कर रही हैं। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि यह समय राजनीतिक बयानबाजी का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का है।
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने भारत के साथ-साथ ब्राजील जैसे देशों को भी परेशान किया है। अमेरिका अब केवल अपने फायदे की सोच रहा है, चाहे इसके लिए उसे वर्षों पुराने सहयोगियों को भी टक्कर क्यों न देनी पड़े। यह वैश्विक परिस्थितियों का एक नया दौर है, जहां आर्थिक प्रतिबंध और टैरिफ ही नए हथियार बन गए हैं। ऐसे में भारत को केवल एक मजबूत सरकार की ही नहीं, बल्कि एकजुट विपक्ष की भी जरूरत है, जो सरकार की आलोचना तब करे जब देश सुरक्षित हो, लेकिन जब देश संकट में हो, तो सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो।
मुद्दा मोदी नहीं देश: मायावती
मायावती ने यह बात बहुत साफ तरीके से कह दी कि यह मुद्दा केवल मोदी सरकार का नहीं, बल्कि पूरे देश का है। टैरिफ का प्रभाव केवल सरकार पर नहीं, बल्कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था और जनता पर पड़ेगा। इसलिए इसे केवल राजनीतिक चश्मे से देखना एक गंभीर भूल होगी। उन्होंने यह भी दिखा दिया कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि संकट के समय में मार्गदर्शन देना और जनता को एकजुट करना भी है।
यह उदाहरण विपक्ष की अन्य पार्टियों के लिए भी एक सीख होनी चाहिए। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना और हर मौके को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना अब जनता की नजरों में विश्वास खोने का कारण बनता जा रहा है। मायावती ने यह दिखा दिया कि अगर विपक्ष जिम्मेदार और राष्ट्रभक्त भूमिका निभाए तो वह सत्ता में रहे या न रहे, जनता का भरोसा ज़रूर जीत सकता है।
इस समय जब भारत अमेरिका के आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है, तब मायावती का यह संतुलित और दूरदर्शी रुख यह बताता है कि राजनीति को राष्ट्रनीति से जोड़ना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है। मायावती का यह बयान सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शन है कि राष्ट्र संकट में हो तो राजनीतिक मतभेदों को भूलकर एक साथ खड़ा होना चाहिए। यह भारत के राजनीतिक इतिहास के उन दुर्लभ क्षणों में से एक है, जब एक नेता ने सही मायनों में विपक्ष को उसकी जिम्मेदारी का अहसास दिलाया है।
अगर इस कठिन दौर में अन्य विपक्षी दल भी मायावती की तरह सोचें और काम करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत हर प्रकार के विदेशी दबाव का सफलतापूर्वक मुकाबला कर सकता है। यही वह समय है जब राष्ट्रीय एकता को केवल नारे में नहीं, व्यवहार में भी बदलना होगा। और इस दिशा में पहला मजबूत कदम मायावती ने उठा लिया है। अब देखना यह है कि बाकी राजनीतिक दल इस उदाहरण से कुछ सीखते हैं या नहीं।
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