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यहां की थी मां सीता ने तपस्या और लव कुश को दिया था जन्म !

मां सीता का ये मंदिर स्थित है उत्तराखण्ड के रामनगर से 20 किलोमीटर दूर घने जगंलो से घिरा है। ये मंदिर त्रेता युग से यहा स्थापित है कहते है मां सीता ने यहा तप किया था इसलिए इसे मां सीता की तपोभूमि भी कहते है इस पावन धरा पर मां- सीता ने बिना परिवार के लव और कुश को जन्म दिया महार्षि बाल्मिकी ने यहां लव-कुश को शिक्षा दी थी और ये वन अपने सौन्दर्य के लिए भी जाना जाता है।

आज हम आपको लेकर जाएंगे त्रेतायुग के एक प्राचीन मंदिर की पावन धरा पर, जहां कभी मां सीता का वास था। जहां कभी लव-कुश की किलकारीयां गुंजा करती हैं। इस स्थल पर आने के लिए आपको कोई प्लान नहीं बनाना पड़ता, बल्कि मां सीता का बुलावा आता है। इस मंदिर का नाम है सीतावनी।
आज हम आपको इस मंदिर के कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बतायेंगे, जिन्हें सुनकर आपका मन भी यहां आने के लिए मचल उठेगा।

उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर से लगभग 22 किलोमीटर दूर घने जंगलों से घिरा हुआ यह मंदिर, मां सीता को समर्पित है। कहा जाता है कि वनवास के दौरान भगवान राम की पत्नी, मां सीता, यहां रुकी थीं। यह मंदिर अपने आप में आध्यात्मिकता और प्रकृति का अनोखा मिलन है। चारों ओर सुंदर पहाड़ और घने जंगल, जो यह गवाही देते हैं कि यह मंदिर भूमिजा को समर्पित है और यह मंदिर मां सीता के वनवास काल से जुड़ा हुआ है।
मां सीता कभी इस कुटिया में रहा करती थीं, कभी इन धाराओं में स्नान करने आती थीं, और यही वो धरा है जहां लव-कुश खेला करते थे लेकिन ये धाराएं अभी भी कई रहस्यों को समेटे हुए हैं। प्राचीन काल में यहां पांच धाराएं बहती थीं – एक दूध की, एक अमृत की, और तीन जल की। लेकिन जैसे-जैसे अधर्म बढ़ा, इनमें से दो धाराएं विलुप्त हो गईं। वर्तमान में सिर्फ तीन धाराएं बहती हैं, लेकिन आज तक कोई भी यह नहीं जान सका कि इन धाराओं में जल कहां से आता है , अभी तक ये एक रहस्य ही बना हुआ है।


इसके साथ ही जब हमने अपने सामने एक बोर्ड पर लिखी जानकारी को देखा तो हमारा मन भी खुश हो गया क्या है जानकारी आप भी जानिए प्रमाण पत्र चला देना  इसी मंदिर के पास है एक गांव है जिसमें राजा राम ने वनवास के समय विश्राम किया था कहते है त्रेता युग में जब भगवान राम ने यहां ठहरे थे तभी से इस गांव का नाम रामपुर पड़ गया और आज भी इस गांव में भगवान राम की पूजा होती है। तो वहीं भगवान राम और मां सीता ने इस मंदिर में खुद एक शिवलिंग की स्थापना त्रेता युग में की थी तभी से यहां भगवान शिव की भी पूजा होती है और हर साल यहां महाशिवरात्रि का मेला भी लगता है, इस मेले में लोग दूर - दूर से घूमने आते है और जब हमने मेले में आये श्रद्धालुओं से बात की तो उन्होंने क्या कहा आइए बताते है।  कार्बेट नेशनल पार्क का हिस्सा है घने जंगलों से घिरा ये मंदिर, चारों तरफ पक्षियों का मधुर संगीत, पेड़ों की सरसराहट,  पानी की आवाजें सुकून का अनुभव कराती है और इसी सुकून का अनुभव करने लोग देश- विदेश से यहां घूमने आते है इस जगह पर आकर आप प्रकृति के साथ-साथ अध्यात्म को भी प्राप्त कर सकते हैं। 

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